Mojo – in poetic prime

Some poetic compositions..by MoJo

जाने कितने राजू पनपेंगे

Posted by Mohan on March 31, 2009

जब जब हर्षद को पूजेंगे
जाने कितने राजू पनपेंगे

दुर्नीति, दुराचार, दुष्टता करेंगे
जग-भर में बहुख्याति पायेंगे
लूट खसोट कर सुख भोगेंगे
खबरियों के भाग्योदय करेंगे

जब नटवर महिमामंडित होंगे
जाने कितने राजू पनपेंगे

नटवर-हर्षद आदर्श हों जिनके
खबरिया जग में चर्चे उनके
हर कुकर्मी यथावत गुणगान पायेंगे
तभी तो पंधेर-से पापी छूटेंगे

जब-जब शोभराज-प्रणय गीत भजेंगे
जाने कितने राजू पनपेंगे

लाला, तिलक, भगत को भूलेंगे
आजादजी को विस्मृत कर देंगे
बोस के निर्वाण पर राजनीति करेंगे
अब्दुल हमीद- अश्फाक को छोड़

जब जब अबू सलेम गायेंगे
जाने कितने राजू पनपेंगे

सत्पथियों पर प्रश्न कसेंगे
खलनायक की ओर झुकेंगे
सैफ को लंगडा त्यागी देखेंगे
शाहरुख़ में जब बाजीगर ढूंढेंगे

किडनी चोर को जब किंग कहेंगे
जाने कितने राजू पनपेंगे

जाने कितने राजू पनपेंगे
गली-गली कुत्ते राज करेंगे
नग्नता के नए आयाम रचेंगे
खबरियों के दिन चरम पर होंगे

‘मन’ कहो वो दिन कैसे होंगे :(
जब इतने सारे राजू पनपेंगे

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बचपन में बड़ा बोझ रे बाबा

Posted by Mohan on March 23, 2009


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कभी-कभी जब प्रातः भ्रमण को जाता हूँ तो पार्क के रस्ते में एक प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल पड़ता है | कारों से बड़ा-बड़ा बोझ निकालते हुए छोटे-छोटे बच्चे दिखते हैं | उन्हें देख कर मन कुंठित हो उठता है | उसी कुंठा में एक दिन लिख बैठा| अपनी प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त कीजियेगा |

धन्यवाद

- मोहन (मोजो)

 

बचपन और बोझ

बचपन और बोझ

 

 

 

 

बचपन में बड़ा बोझ रे बाबा !!

 

एक-आध में पढ़ते होंगे

दीर्घ शंका में खेलते होंगे

इकटक चीजों को देखते होंगे

बच्चे हैं सो बचपन रे बाबा

मुख की मुस्की खोई रे बाबा

पीठ में जो इतना बोझ रे बाबा

बचपन में बड़ा बोझ रे बाबा !!

 

पाठशाला को ही जाते हैं

पर ज्यों अखाड़े को जाते रे बाबा

पहलवान के कंधे पे मुद्गल जैसे

वैसा झोला ढ़ोते रे बाबा

फिर मास्टरनी की डपट रे बाबा

घर पर पिजड़ा बाहर जेल

पियू बना तोता रे बाबा

बचपन में बड़ा बोझ रे बाबा!!

 

और हम….

छठवे बरस तो पाठशाला गए

वो भी कभी गए कभी नहीं रे बाबा

मिला पहला डपटने वाला

जिस पर माँ भी न भड़की रे बाबा

वरना माँ के गुस्से के आगे

कहाँ कोई बचा रे बाबा

वो तो मास्टरजी रे बाबा

सो कभी गए, कभी नहीं रे बाबा

पुरे छः वर्षों माटी में खेले

पेड़ों पर झूले, खेतों में दौड़े

फिर पाठशाला की दहलीज़ रे बाबा

पर अबके….

बचपन में बड़ा बोझ रे बाबा!!

 

कोमल पंखुड़ियों से हाथ

चंचल तितलियों सी नैना

फूलों से मधुर मुस्कान

माथे पर लकीर, पीठ में झोला रे बाबा

यूं लाख्ताकिये से उतरते रे बाबा

न जानूं, सही या गलत

देखता हूँ, लगे बुरा रे बाबा

लगे ज्यों जग का सारा भर

इन नन्हे कोमल काँधों पर रे बाबा

अबके ……

बचपन में बड़ा बोझ रे बाबा !!!!

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