Mojo – in poetic prime

Some poetic compositions..by MoJo

विचार

Posted by Mohan on November 25, 2015

                            विचार

मनुष्य को छोड़कर, भगवान की इस समस्त सृष्टि में सभी जीव केवल अन्न पोषित हैं । परन्तु मनुष्य अन्न पोषित होने के अतिरिक्त भी एक विशेष पोषण को गृहण करता है। और वह है ‘ विचार’ । अर्थात मनुष्य अन्न पोषित होने के आलावा विचार पोषित जीव होता है ।

हम भारतीय परंपरागत रूप से दोनों प्रकार के पोषण से तृप्त रहे हैं । हर काल खंड अथवा समय पर हमारी भारत भूमि में अलौकिक क्षमताओं से परिपूर्ण ऋषि-मुनि-महात्मा-वैरागी अथवा अन्य महापुरुष पैदा हुए हैं, जिन्होंने अपने ओजश्वी विचारों से सामान्य जन-मानस को विचार पोषित करने का कार्य किया है। आदि पुरुष मनु महाराज से लेकर आदि शंकराचार्य, महात्मा बुद्ध, गुरु नानक देव, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी तक, हम हर कालखण्ड में ऐसी विभूतियों की उपस्थिति महसूस करते रहे हैं ।

अगर बृहद रूप में न जाया जाय तो भी हर कुटुंब या परिवार का मुखिया हमेशा परिवार के कनिष्ठ जनों का किसी न किसी रूप में विचार पोषण करता ही रहता है । हम दादी-नानी की कहानियों की अक्सर बात करते हैं, जो परिवार की बुजुर्ग महिलयायें होती हैं और अपने नाती-पोतों को किस्से कहानिया सुनाया करतीं थीं।

इन्हीं छोटी-बड़ी सीखों और विचार श्रंखलाओं से हमारा जनमानस परंपरागत रूप से विचार पोषित होता रहा है। ये सामाजिक सहकर्तब्य हमारे समाज को तमाम बाहरी विकृतियों से बचाता आया है और अप्रत्यक्ष रूप से हमारी सुख-समृद्धि का मुख्य अवयव रहा है।

चूँकि हमारा विचार पोषण हमेशा सकारात्मक एवं सदाचरण को बढ़ाने वाला रहा है, इसीलिए हम ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ अथवा ‘सरबत दा भला’ वाली संस्कृति को न केवल अनुशरण करते हैं बल्कि सही अर्थों में जीवन में अनुभव भी करते रहे हैं। इसके उलट नकारात्मक और निंदक विचार पोषण की वजह से आज हम देखते हैं कि आतंकवाद एक विभीषिका का स्वरुप ले चुका है।

‘आतंकवाद’ भी वास्तव में विचार पोषित मनुष्यों के कृत्यों का ही परिणाम है। चूँकि उनका विचार पोषण नकारात्मक हुआ है जिससे वे लोग हिंसक एवं अमानवीय कृत्यों में लिप्त रहते हैं। कोई २०-२२ साल का लड़का आखिर क्यों सैकड़ों लोगों का खून बहाने में अपनी तृप्ति ढूंढता है ? जवानी में कदम रखते ही खुद मरने और अन्य लोगों को मारने के लिए तैयार हो जाता है, आखिर क्यों?

ये सब विचार-पोषण का परिणाम है। सकारात्मक विचार मिलेंगे तो कोई A.P.J Abdul Kalam बन जाता है और नकारात्मक विचार मिले तो ओसामा लादेन।

जब तक हम महापुरुषों के विचारों को पढ़ते, सुनते और समझते रहेंगे या फिर हमारे परिवार के बुजुर्गों, दादी-नानी की कहानियों से विचार पोषित होते रहेंगे तब तक हमारे समाज और देश को कोई खतरा नहीं है। जब तक हमारे आदर्श, श्रेष्ठ विचारों एवं कृत्यों को स्थापित कर चुके महापुरुष होंगे तब तक कोई समस्या नहीं है। परन्तु मैं हाल-फ़िलहाल हमारे समाज में नए आदर्शों को स्थापित होते देख रहा हूँ। टी.वी. संस्कृति की वजह से परिवार के बड़ों के साथ संवाद सीमित हो चले हैं और ऊपर से एकल परिवारवाद ने इसे और कठिन कर दिया है। विचार पोषण का एक प्रमुख स्रोत इस तरह काफी क्षीण हो चला है। परन्तु विचार पोषण की खुराक मनुष्य कहीं न कहीं से तो ले ही लेता है। इसलिए नया स्रोत टी.वी. अथवा अन्य माध्यमों पर दिखने वाले लोग बन रहे हैं। नचैया-गवैय्या लोगों को आदर्श के रूप में देखना एक भारी सामाजिक विद्रूपण (विकृति) का द्योतक सिद्ध हो सकता है। चूँकि नचैया-गवैय्या लोगों का अपना कोई स्थिर चरित्र नहीं हो सकता है, उनका अनुशरण करने वाले भी चारित्रिक रूप से दृढ़ नहीं हो सकते हैं।

अतः ये बहुत आवश्यक है कि हमारे समाज में विचार-पोषण की हमारी परंपरागत पद्यतियों का पुनरुद्भवन हो। विचार-पोषण के महत्व को प्रत्येक व्यक्ति ने एक पिता, माता, पुत्र, भाई,गुरु अथवा अन्य हर किसी भूमिका में समझना होगा।

नोट: ये लेख असहिस्णुता का प्रचार करने वाले स्वघोषित स्टार्स से सम्बद्ध नहीं है।

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